Friday, November 4, 2011
क्या आपको पता है आजादी की लड़ाई में कुछ अनुसूचित जातियों एवम जनजातियो ने भी उग्र आन्दोलन को अपनाया था?
क्या आपको पता है आजादी की लड़ाई में कुछ अनुसूचित जातियों एवम जनजातियो ने भी उग्र आन्दोलन को अपनाया था?
अगर नहीं तो ध्यान दे :-
हो आदिवासियों का विद्रोह (१८२०):-
हो जनजाति के लोग सिंह भूमि एवं चाईबासा के पहाड़ी क्षेत्रो में रहते थे और इन्होने किसी भी बाहरी शक्ति की अधीनता कभी स्वीकार नहीं की थी !
१८२० में वीरभूमि के राजा की सलाह से अंग्रेजो ने उन्हें अधीन करने का प्रयास किया तो हो लोगो ने उनका भयानक हिंसक प्रतिकार किया पर कंपनी की भारी सेना के बल प्रयोग के आगे वे १८२१ में समझौता करने के लिए बाध्य हो गए. लेकिन इसके बाद भी वो विद्रोह करते रहे और १८३१ के मुंडा विद्रोह में भी समर्थन दिया!
पागलपंथी विद्रोह(१८२५) :-
वर्तमान बंगलादेश के मैमनसिंह जिले के गारो एवं हाजंग जनजातियो ने ये विद्रोह अंग्रेजो के शह पर शोषण करने वाले जमींदारों के खिलाफ किया ! इसे पागलपंथी विद्रोह इस लिए कहा जाता है क्यों की इसका नेतृत्व "बाउल संप्रदाय" के टीपू ने किया था और उस संप्रदाय के लोग एक दुसरे को पागल कहते थे. १८२५ में यह विद्रोह प्रारंभ हुआ था १८२७ में टीपू को गिरफ्तार करके आजीवन कारावास के लिए भेज दिया गया उसके बाद जानकु पाथर और दोब्राज पाथर ने किया इसका नेतृत्व किया. १८३३ के मध्य में इस व्द्रोह को कुचल दिया गया.
खासी विद्रोह (१८२९):-
असम क्षेत्र में खासी जनजाति के के लोगो ने ये विद्रोह अपने क्षेत्र में अंग्रेजो के हस्तक्षेप के विरोध में किया था ! यह विद्रोह १८२९ से १८३३ तक चला इसमे खासियो के साथ गारो, भूटिया , सिंगफो, आदि जाती के लोगो ने साथ दिया! तीरथ सिंह, बार मानिक , और मुकुंद सिंह इस विद्रोह के प्रमुख नेता थे . याह विद्रोह भारत में अंग्रेजो के विरुध्द हुए सबसे शसक्त विद्रोहों में से एक था .
सिंगफो विद्रोह (१८३०):-
असम में यह अंग्रेजो के खिलाफ अंतिम शसक्त विद्रोह था. सिंगफो जाती के लोग १८२५ में अंग्रेजो से परास्त हुए थे पर उन्होंने अंग्रेजो की दासता स्वीकार नहीं की और १८३० में शसक्त विद्रोह किया जिसे १८३१ में कुचल दिया गया.इसका नेतृत्व रनुआ गोसाई ने किया था जिस्म असम एवं बर्मा की सीमा पे रहने वाली जातियों ने सहयोग दिया था.
कोल विद्रोह(१८३१-१८३२) :-
रांची, हजारी, सिंघ्भूम, पलामू आदि क्षेत्र के कोल जनजाति के लोगो ने ईस्ट इंडिया कंपनी एवं उसके समर्थित जमींदारों के खिलाफ १८३१-१८३२ में एक शसक्त विद्रोह किया. इसे मुंडा विद्रोह भी कहते है क्यों की कोलो के सरदार मुंडा कहलाते थे . इस विद्रोह में कोलो का साथ हो जाती के लोगो ने भी किया था.बुध्धो भगत इस विद्रोह के प्रमुख नेता थे.
खोंड विद्रोह (१८४६) :- इस विद्रोह को उड़ीसा के खोंड जनजाति के लोगो ने किया था.
पहाड़िया विद्रोह (१७७८ ):-
पहाड़िया राजमहल की पहाडियों में में बसी एक लड़ाकू जनजाति थी जिसने अपने क्षेत्र में अतिक्रमण किये जाने पर १७७८ में शसक्त हिंसक विद्रोह प्रारंभ कर दिया. स्थानीय जनजातियो सरदारों ने इसका नेतृत्व किया. यह विद्रोह अत्यंत हिंसक एवं क्रूर था जिसके आगे अंग्रेजो को झुकाना पड़ा और उन्होंने संधि कर ली एवं पहाड़िया जातियों के लोगो की मांगे मान ली तथा इस क्षेत्र को "दामिनी कोल" घोषित कर दिया.
खारवांड विद्रोह (१८७०):- यह विद्रोह १८७० में हुआ था खारवांड जाती द्वारा किन्तु बाद के वर्षो में इसे कुचल दिया गया.
खोंड डोंगा विद्रोह :-
यह विद्रोह विशाखापत्तनम के दाबुर आदिवासी क्षेत्र में खोंदा डोर नमक जनजाति द्वारा किया गया था. इसका नेतृत्व कोरी मल्लय ने किया था.
नैकादा आन्दोलन :-
इस आन्दोलन का प्रारंभ नैकादा जनजाति के लोगो ने किया था जिन्होंने अंग्रेजो के थाणे पर आक्रमण किया था और सवर्ण हिन्दुओ पर भी बाद में अंग्रेजो ने बल प्रयोग कर के इनका सफाया कर दिया.
भील विद्रोह:-
यह विद्रोह राजस्थान के दक्षिणी क्षेत्रो के डूंगरपुर, बांसवाडा तथा सुंठ में भील नमक जनजाति द्वारा किया गया था . विद्रोही गोविन्द गुरु को अपना आदर्श मानते थे तथा उन्होंने ने भीलराज स्थापित करने की चेष्टा की . भील मंगल पहाडियों पर अंग्रेजो एवं भीलो में भयंकर युध्द हुआ तब कही जाकर इस विद्रोह को दबाया जा सका अनेक विद्रोही मारे गए एवं बचे हुए बंदी बना लिए गए!
बस्तर का विद्रोह (१९१०);-
१९१० में यह विद्रोह जगदलपुर की जनजातियो ने बस्तर के ने किया था वह के राजा के खिलाफ जिसने अंग्रेजो से संधि कर ली थी. और उनपर वन अधिनियमों को लागू किया था.
कोया विद्रोह (१८७९-१८८०):-
यह विद्रोह आन्ध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी क्षेत्र से प्रारंभ हुआ तथा उड़ीसा के कुछ क्षेत्रो को भी इसने प्रभावित किया. इस विद्रोह का मुख्या केंद्र चोदावाराम का रम्पा प्रदेश था ! इस क्षेत्र में कोया एवं सोरा नामक जनजातियो पहले भी विद्रोह किया था . १८७९-१८९० में येह जो विद्रोह हुआ उसका नेतृत्व टोम्मा सोरा नामक व्यक्ति ने किया था! जो के आन्दोलन में मारा गया जिसके बाद विद्रोह को कुचल दिया गया.
१८८६ में ये आन्दोलन फिर से हुआ जिसका नेतृत्व राजा अनंतातैय्यर नामक व्यक्ति ने किया.
कूकी विद्रोह:-
यह विद्रोह मणिपुर की कूकी जनजातियो द्वारा किया गया था.इस विद्रोह का मुख्य कारण जनजातियो का शोषण तथा उत्पीडन बना .
नागा आन्दोलन :-
यह आन्दोलन नागा जनजाति द्वारा प्रारंभ किया गया, जिसका नेतृत्व एक युवा नागा नेता जादोनांग ने किया! प्रारंभ में यह आन्दोलन एक सामाजिक सुधार आन्दोलन था जिसका उद्देश्य नागा जनजाति की बुराईयों को दूर करना एवं प्राचीन धर्म को पुनर्जीवित करने का प्रयास था! किन्तु बाद में आन्दोलन ने अंग्रेज विरोधी रुख अख्तियार कर लिया.अंग्रेजो ने जादोनांग को गिरफ्तार कर १९३१ में फांसी पर लटका दिया!
जादोनांग की मृत्यु के बाद एक युवा नागा महिला गैदिनलियु ने इसे नेतृत्व प्रदान किया! गैदिन्लियु ने नागाओ के उतपीरण व् भेदभाव का विरोध करने तथा अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने को प्रोत्साहित किया! कालांतर में यह आन्दोलन राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ गया ! आन्दोलन कारियों ने गांधी जी को अपना आदर्श मानकर अंग्रेजो से संघर्ष किया ! आजाद हंड फ़ौज तथा नेहरू ने गैदिन्लियु को "रानी" की उपाधि से विभूषित किया! बाद में अंग्रेजो ने सख्ती का प्रयोग कर आन्दोलन को समाप्त कर दिया!
रम्पा विद्रोह:-
आन्ध्र प्रदेश के रम्पा क्षेत्र के आदिवासियों ने ज्यादतियों के खिलाफ १८४० से १९२४ के बिच कई विद्रोह किये, जिनमे १८७९-८० और १९२२-२४ के विद्रोह बहुत ही बड़े थे!
इन आन्दोलन के अलावा दो अन्य आन्दोलन है संथाल एवं मुंडा विद्रोह जिन्हें मैं विस्तार पूर्वक आगे की अंक में प्रदर्शित करूँगा उनके बारे में कम शब्दों में लिखना अन्याय होगा ! धन्यवाद!! जय हिंद जय भारत !!
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